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Coal Gasification Scheme: कोयले से गैस बनाने के ल‍िए लग गई कंपन‍ियों की लाइन, अदाणी-NTPC समेत 7 ने लगाया दांव

जिस कोयले को अब तक बिजली बनाने के लिए जलाया जाता रहा है, सरकार उसी कोयले से अब गैस, यूरिया, हाइड्रोजन, मेथनॉल और दूसरे काम के प्रोडक्ट बनाने की तैयारी कर रही है. कुछ द‍िनों पहले सरकार ने Coal Gasification Scheme का ऐलान क‍िया था और अब इसके ल‍िए प्रोजेक्‍ट पर काम भी शुरू हो गया है. सरकार ने आवेदन मांगे तो कंपन‍ियों की लाइन लग गई. 37,500 करोड़ की इस स्‍कीम के पहले राउंड में अडाणी, एनटीपीसी समेत 7 कंपन‍ियों ने आवेदन कर द‍िए हैं.
पहले समझिए कोयले से गैस बनेगी कैसे? कोल गैसीफिकेशन में कोयले को सामान्य तरीके से पूरी तरह जलाया नहीं जाता. इसके बजाय कंट्रोल्‍ड मात्रा में ऑक्सीजन, भाप या दोनों की मौजूदगी में बहुत ज्यादा तापमान पर कोयले को रिएक्ट कराया जाता है. इस प्रॉसेस में कोयले का कार्बन और हाइड्रोजन पानी की भाप और ऑक्सीजन के साथ र‍िएक्‍शन करते हैं. इससे एक गैस मिश्रण बनता है, जिसे सिंथेसिस गैस यानी Syngas कहा जाता है. इसमें मुख्य तौर पर कार्बन मोनोऑक्साइड और हाइड्रोजन होते हैं.
अब असली खेल यहीं से शुरू होता है. इस Syngas को साफ और प्रोसेस करके अलग-अलग केमिकल और ईंधन बनाए जा सकते हैं. यानी कोयला सिर्फ भट्ठी में जलकर खत्म नहीं होता, बल्कि उसे एक तरह के कच्चे माल की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है.
स्टील इंडस्ट्री के लिए डायरेक्‍ट र‍िड्यूस्‍ड आयरन यानी DRI बनाया जा सकता है.
इंडस्ट्रियल इस्तेमाल के लिए अलग-अलग सिंथेसिस गैस आधारित प्रोडक्ट तैयार किए जा सकते हैं

7 कंपनियों ने किस चीज पर लगाया दांव?
पहले राउंड में मिले सात आवेदनों में कंपनियों ने अलग-अलग तरह के प्रोजेक्ट प्रस्तावित किए हैं.
Adani Enterprises ने तीन अलग-अलग आवेदन दिए हैं. तीनों का फोकस यूरिया प्रोजेक्ट पर है.
NTPC ने Synthetic Natural Gas यानी SNG बनाने के प्रोजेक्ट के लिए आवेदन किया है.
Talcher Fertilisers ने भी यूरिया प्रोजेक्ट का प्रस्ताव दिया है.
Gallantt Ispat ने DRI और Syngas से जुड़ा प्रोजेक्ट रखा है.
वहीं Shyam Sel & Power ने Syngas बनाने का प्रस्ताव दिया है.
यानी कंपनियों की दिलचस्पी सिर्फ गैस बनाने तक सीमित नहीं है. कोई यूरिया बनाना चाहता है तो कोई स्टील के लिए जरूरी DRI, जबकि कोई सिंथेटिक गैस तैयार करना चाहता है.
सरकार ने 37,500 करोड़ क्यों लगाए?
सरकार ने इस योजना को 13 मई को मंजूरी दी थी. इस पर 37,500 करोड़ रुपये खर्च होने हैं. इसका मकसद घरेलू कोयले और लिग्नाइट से ज्यादा वैल्यू वाले प्रोडक्ट बनाना है. सरकार चाहती है कि भारत अपने यहां उपलब्ध कोयले का इस्तेमाल सिर्फ बिजली उत्पादन के लिए न करे, बल्कि उससे ऐसे प्रोडक्ट बनाए जिनकी देश में बड़ी मांग है और जिनके लिए भारत को विदेशों से आयात करना पड़ता है.
फोकस एक्‍सपोर्ट पर ज्‍यादा
सरकार का एक बड़ा लक्ष्य LNG, यूरिया, अमोनिया और मेथनॉल जैसे प्रोडक्ट के आयात पर निर्भरता घटाना है. कोयला मंत्रालय के मुताबिक, वित्त वर्ष 2024-25 में इन प्रोडक्ट के आयात पर करीब ₹2.77 लाख करोड़ खर्च हुए थे. अब सरकार चाहती है कि इस खर्च का एक बड़ा हिस्सा देश के भीतर उत्पादन बढ़ाकर कम किया जाए. अगर घरेलू कोयले से ही फर्टिलाइजर, सिंथेटिक गैस या दूसरे प्रोडक्ट तैयार होने लगते हैं, तो इससे विदेशी मुद्रा की बचत के साथ-साथ घरेलू इंडस्ट्री को भी फायदा हो सकता है.
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3 लाख करोड़ तक के निवेश की उम्मीद
सरकार को उम्मीद है कि इस योजना से करीब ₹2.5 लाख करोड़ से ₹3 लाख करोड़ तक का निवेश आकर्षित हो सकता है. इतना बड़ा निवेश सिर्फ गैसीफिकेशन प्लांट तक सीमित नहीं रहेगा. इसके साथ कोयले की सप्लाई, मशीनरी, इंजीनियरिंग, ट्रांसपोर्ट, स्टोरेज और दूसरे सपोर्टिंग कारोबार भी बढ़ सकते हैं. यानी कोयले को गैस में बदलने की यह कोशिश आगे चलकर एक पूरी नई इंडस्ट्रियल वैल्यू चेन खड़ी कर सकती है.
2030 तक 100 मिलियन टन गैसीफिकेशन का टारगेट
सरकार ने 2030 तक 100 मिलियन टन कोयला गैसीफिकेशन क्षमता तैयार करने का लक्ष्य रखा है. इसमें मौजूदा योजना के तहत 75 मिलियन टन क्षमता विकसित करने का लक्ष्य है. इसके लिए सरकार सिर्फ बड़ी कंपनियों का इंतजार नहीं कर रही. योजना के तहत आवेदन के अलग-अलग राउंड रखे गए हैं, ताकि कंपनियों को अपने प्रोजेक्ट तैयार करके मौका मिल सके.
दूसरे राउंड की विंडो भी खुल गई
पहले राउंड का RFP 7 जुलाई 2026 को जारी हुआ था. इसमें सात कंपनियों ने आवेदन किया. अब 8 सितंबर से दूसरे राउंड के आवेदन शुरू हो गए हैं. इसके बाद हर दो महीने में आवेदन की नई विंडो खुलने की योजना है.
सरकार का कहना है कि कई कंपनियां पहले से अपने प्रोजेक्ट की तैयारी कर रही हैं. कुछ प्रोजेक्ट तो एडवांस स्टेज में पहुंच चुके हैं. ऐसे में आने वाले राउंड में और आवेदन आने की उम्मीद है.
कोयला गैसीफिकेशन कोई छोटा-मोटा प्लांट लगाने वाला कारोबार नहीं है. इसमें भारी पूंजी और बड़ी तकनीकी तैयारी की जरूरत होती है.
कंपनियों को प्रोजेक्ट शुरू करने से पहले प्री-फिजिबिलिटी स्टडी, टेक्नोलॉजी असेसमेंट, पर्यावरण से जुड़ी जांच और फाइनेंशियल प्लानिंग करनी पड़ती है.
इसी वजह से सरकार के पहले राउंड में सात आवेदन आना भी इंडस्ट्री की शुरुआती दिलचस्पी का संकेत माना जा रहा है.

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